jivan

जीवन जीने की उसमे हर पल एक आशा थी,
हर दर्द को चीरके हौंसला बुलंद रखती थी वोह,
पर इतने तूफान झेलने के बाद क्या करे कोई ,थोड़ी धूल तो उसपे भी चढ़नी ही थी.
धूल क्या चढ़ी उसकी हस्ती धुंधली सी लगने लगी
लगातार कोशिश की उसने साफ करने की पर अब धूल का रंग छूटने लगा.
फिर उठी वोह उस धुन्ध मैं खुद को ढूँढने के लिए
हल्का सा कुछ दिखने लगा तो देखा यहाँ तो ज़ॅंग लग चुकी है इंसानो पर
इस धूल और ज़ॅंग के बीच में कही अभी भी दिख रहे कुछ साफ मन बाकी
तभी वो फिर जाग उठी आशा तूफ़ानो से लड़ने की….

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