कविताएं

तकल्लुफ हो जो इंसाँ को तो इंसाँ ही समझता है ।
इबादत सच्ची हो तो,खुद खुदा उसको समझता है।
कोई क्या खाक समझेगा हमारे दर्द का मंजर……
जो प्यासा हो  समंदर तो वो दरिया ही समझता है।

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