शीशों का मसीहा कोई नहीं – फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ | Shishon ka masiha koi nahin – Faiz Ahmad Faiz

बोलतेचित्र 2 – शीशों का मसीहा कोई नहीं – फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ | Shishon ka masiha koi nahin – Faiz Ahmad Faiz

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हिंदी में :

शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं
वो साग़र-ए-दिल है जिस में कभी
सद-नाज़ से उतरा करती थी
सहबा-ए-ग़म-ए-जानाँ की परी
फिर दुनिया वालों ने तुम से
ये साग़र ले कर फोड़ दिया
जो मय थी बहा दी मिट्टी में
मेहमान का शहपर तोड़ दिया

सद-नाज़ = सैकडों नखरे, सहबा-ए-ग़म-ए-जानाँ = प्रेमिका के दु: ख की शराब,
शहपर = सबसे मजबूत पंखफ़ैज़ अहमद फ़ैज़

In Hinglish or
Phonetic :

Shaayad ki inheen ṭukadon men kaheen
vo saagar-e-dil hai jis men kabhee
sad-naaza se utaraa karatee thee
sahabaa-e-gam-e-jaanaan kee paree
fir duniyaa vaalon ne tum se
ye saagar le kar fod diyaa
jo may thee bahaa dee miṭṭee men
mehamaan kaa shahapar tod diyaa

sad-naaza = saikaḍaon nakhare, sahabaa-e-gam-e-jaanaan = premikaa ke duah kh kee sharaab, shahapar = sabase majaboot pnkhFaiz Ahmad Faiz

निवेदन :

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